कोरबा / फेफड़ों को छलनी कर रही लाखों टन राखड़, लोगो की बजट पर पड़ रहा है असर

acn18.com/ छत्तीसगढ़ में पावर का शहर कहे जाने वाला कोरबा राज्य के आधे से ज्यादा इलाकों को बिजली पहुंचा कर रौशन कर रहा है, लेकिन खुद का जीवन मानों प्रदूषण के अंधकार में समिटता जा रहा है। कोयले की वजह से लगभग पूरा शहर कालिख की चपेट में रहता है। सड़कों और इमारतों पर कालिख की परत आप आसानी से देख सकते हैं। इसी शहर में कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां कोयले की कालिख नहीं, बल्कि जले हुए कोयले की राख मिलती है। जी हां हम बात कर रहे हैं राखड़ की, जिसकी चपेट में कोरबा के तमाम इलाके हैं। ये वो इलाके हैं, जहां पर पावर प्लांट बने हुए हैं। पेश है एक रिपोर्ट, जिसमें हम दिखायेंगे कि किस तरह से राखड़ किस तरह से यहां के लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित कर रही है। आपको बता दें कि राखड़ ही है, जिसके चलते कोरबा देश का पांचवां सबसे प्रदूषित शहर है।

फ्लाई ऐश यानी राखड़ वह राख होती है, जो कोयले के जलाये जाने के बाद निकलती है। कोरबा में सात अधिक पावर प्लांट हैं और सभी र्थमल पावर प्लांट कोयले पर आधारित हैं। स्‍थानीय कोयले की खानों से यहां पर कोयला पहुंचाया जाता है और उसी कोयले को जलाकर ऊर्जा पैदा की जाती है। राखड़ पॉवडर की तरह होती है, जो पावर प्लांट की फरनेस के निचले भाग में एकत्र हो जाती है। इस राखड़ में आर्सेनिक, पारा यानी मरकरी, सीसा यानी लेड, वैनेडियम, थैलियम, मॉलीबेडनम, कोबाल्ट, मैंगनीज़, बेरीलियम, बेरियम, एंटीमनी, एल्युमिनियम, निकेल, क्लोरीन और बोरोन जैसे तत्व पाये जाते हैं। इन्‍वॉरेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी ईपीए की रिपोर्ट के अनुसार राखड़ में से अधिकांश तत्व हेवी मेटल यानी भारी धातु हैं, जिनकी जद में निरंतर आने पर किसी भी व्यक्ति को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है। यानी ऐशपॉन्‍ड के आस-पास रहने वाले लोगों को हमेशा गंभीर बीमारियों का खतरा बना रहता है।

कोरबा में जब पावर प्लांट स्‍थापित किये गये, तो प्लांट से निकलने वाली राखड़ को खुदे मैदानों में फेंक दिया जाता था। लेकिन 1999 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सख्‍त हिदायद के बाद लगभग सभी पावर प्लांट्स ने राखड़ को मैदान में छोड़ने के बजाये ऐश डेम बनाने शुरू कर दिये। नियम के अनुसार सभी आठ पावर प्लांट्स को राखड़ के लिये एक बड़ा सा गड्ढा बना कर उसमें राखड़ छोड़नी होती है ताकि इस राखड़ का प्रयोग ईंट व सीमेंट बनाने में किया जा सके। लेकिन कोरबा में अब भी कई प्‍लांट हैं, जहां या तो ऐश डेम पूरी तरह भर चुके हैं, या वहां खुले मैदान में राखड़ छोड़ दी जाती है।

हाल ही में हमने बालको पावर प्लांट के पास बने ऐश डेम का दौरा किया तो पाया कि डेम पूर तरह भर चुका है। उसमें पानी भी पूरी तरह सूख चुका था। राखड़ सूखने के बाद जब तेज़ हवा चलती है, तो ऐश पॉन्‍ड से उड़ कर आस-पास के इलाकों में फैलती है। इस राखड़ में कई ऐसे तत्व होते हैं, जो बेहद खतरनाक हैं। यही नहीं ऐश पॉन्‍ड का पानी रिसने के बाद हसदेव नहर में जाकर मिलता है। इस नहर के पानी का इस्‍तेमाल यहां के स्‍थानीय लोग नहाने, कपड़े धोने आदि के लिये करते हैं। लोगों का कहना है कि पानी में नहाने के बाद खुजली होती है, त्वचा में रैश पड़ जाते हैं, लेकिन मजबूरी है इसलिये इसमें नहाना पड़ता है।
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3 नवंबर 2009 को भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार 2002 से 2003 के बीच 15 लाख टन राखड़ कोरबा के विद्युत संयंत्रों से निकली जो 2006-2007 में बढ़ कर 31.9 लाख टन हो गई। उस वक्त केंद्र सरकार ने सभी पावर प्लांट को सख्‍त निर्देश दिये कि वे इस राखड़ को ऐश पॉन्‍ड में भरें और साथ ही उसका प्रयोग ईंट, पैवलिंग टाइल्स, सीमेंट, रूफिंग शीट, प्रीकास्‍ट वस्‍तुओं, पैवलिंग ब्लॉक, कॉन्‍क्रीट मॉर्टर, भवन निर्माण में होने वाले प्‍लास्‍टर, व सड़क की व्‍हाइट टॉपिंग में किया जाये। साथ ही केंद्र ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सख्‍त निर्देश दिये कि वह यह सुनिश्चित करे कि सभी पावर प्‍लांट फलाई ऐश का प्रयोग इन कार्यों में कर रहे हैं या नहीं। भारत सरकार के उस निर्देश के 10 साल बाद भी आज उसका पालन पूरी तरह से नहीं किया जा रहा है। तमाम ऐश पॉन्‍ड ऊपर तक भर चुके हैं। आलम यह है कि जब गर्मी में राखड़ में मिला पानी सूख जाता है, तब यह धूल की तरह उड़ती है और बारिश में ऐश पॉन्‍ड ओवर फ्लो होने पर आस-पास के इलाकों में राखड़ पानी में मिलकर घुस जाती है।
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ऐश पॉन्‍ड के आस-पास की ज़मीनों का हाल यह है कि जिस एक एकड़ ज़मीन पर 30 बोरी धान पैदा होना चाहिये, उसपर पैदावार महज़ 10 से 15 बोरी तक सीमित रह गई है। इससे कोरबा के सैंकड़ों किसानों का रोजगार मानो छिनता जा रहा है। तेज़ हवा चलने पर जब यह राखड़ उड़ती है, तो पेड़-पौधों पर उसकी धूल जम जाती है। इसकी वजह से पत्तियां गल जाती हैं। यही नहीं फलों का विकास भी रुक जाता है। बालको के पास रहने वाले किसान बताते हैं कि खेतों के साथ-साथ अंडरग्राउंड वॉटर यानी भूगर्भ जल पर भी इसका असर दिख रहा है। हालांकि अब तक प्रदूषण नियंत्रण बोड़ ने भूगर्भ जल के दूषित होने की पुष्टि नहीं की है।
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